काम का आदमी
मन में बहुत कुछ है, पर लिखूं क्या यही समझ में नहीं आ रहा. दिल कहता है कि जीवन जैसे चल रहा है,चलने दो. दिमाग कहता है कि नहीं, फलाने तुम्हारे बाद इस लाइन में आया और आगे बढ़ गया और तुम वहीं के वहीं बैठे हो. आखिर कब तक समझौते पर समझौता करते जाओगे. और एक हम हैं कि काम से समझौता नहीं करते, करते हैं, तो दाम से. किसी ने कहा हम अभी इतना ही दे पायेंगे, तो सोचा चलो बाद में परफार्मेंस देखने के बाद सबकुछ ठीक हो जायेगा. पर नहीं होता है वही ढाक के तीन पात. कहीं कुछ नहीं. कोई तरक्की नहीं, परफार्मेंस को देखनेवाला कोई नहीं. लोगों (बॉस) को शायद लगता है कि इसके बारे में क्या सोचना, यह तो बेवकूफ है ही, जो भी दोगे ले लेगा और कुछ नहीं बोलेगा. और जब कम पैसे में काबिल (अपने आप को कह रहा हूं, अन्यथा न लें) आदमी मिल जाये, तो अधिक दाम देने की जरूरत ही क्या है. दो बार नौकरी बदली और दोनों बार यही अनुभव हुआ. कहीं सैलरी स्लिप न होने की सजा मिली, तो कहीं संबंधों की भेंट चढ़ गया. ऐसे और कितने दिन बिताओगे शुक्लाजी. बीवी मोबाइल मांग रही है, पर लायें कहां से जेब में तो किराया भी नहीं बचा. महीने का आखिर है, किसी तरह काम चल...