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तेरी, मेरी, उसकी...आखिर किसकी अयोध्या

...बचपन से ही घर में सुबह-सुबह उनींदी आंखो¨ के बीच मधुर स्वर में गोस्वामी तुलसीदास के रामचरित मानस की चौपाई...अवध पुरी मम पुरी सुहावन, उत्तर दिस सरजू बह पावन...सुनता आ रहा हूं. बड़के भइया (बड़े पापा के लड़के या यूं कहें बड़की अम्मा के भइया और हम सबके बड़के भइया) स्कूल में पढ़ाते हैं. सुबह उठ कर स्नान ध्यान करते थे. इसमें दादी का उन्हें पूरा सहयोग मिलता था. दोनो¨ में से कोई भी नहाता अवध पुरी... की स्वर लहरी घर में जरूर गूंजती. उस समय अवध पुरी (अयोध्या) की एक निराली ही छटा मन में बसी थी, जो आज भी कायम है. सालो¨ साल यह सिलसिला चलता रहा...आज भी जारी है. दादी के जाने और बड़े भइया के सामने बने नये मकान में चले जाने के बाद भी. भइया आज भी स्कूल जाने से पहले नहाते समय उसी सुर में अवध पुरी मम पुरी...गाते हैं. हालांकि अब उम्र और तबियत साथ नहीं देते, पर उनकी वाणी में किसी भी प्रकार की कमी नहीं झलकती, वह भी तब जब रामचरित मानस में से कुछ गा रहे हो¨. स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद बाबा भोलेनाथ की नगरी बनारस के बीएचयू से स्नातक करने का मौका मिला. अब तो आये दिन अयोध्या के दर्शन होने लगे. अयोध्या होकर ही बनारस...