धरा धरी तो मइया रोई बाप कलेजा चाक हुआ देख खिलौना भैया से हर दिन दो-दो हाथ हुआ सजी चुनरिया मुझ पर सोहे दुनिया की आंखों में गड़ गई जब-जब निकली घर से बाहर कुछ ठिठकी, कुछ सहम गई यह है मेरी शंका अपनी या है इन नजरों का दोष नहीं, नहीं यह सच है मेरा स्वप्न नहीं, पूरा है होश रिश्ते-नाते बड़े करीबी पर सबकी आंखें कुछ बोलें जब भी देखें मेरी जानिब यहां-वहां ऐसे ही डोलें क्यूं ऐसी है उलझन मेरी कहां गए रक्षा के वादे कैसे उड़ूं खुले में अब मैं सबने इतने बोझ हैं लादे बोझ उठाती, कुचली जाती राह सुझा मंजिल दिखलाती सड़क सी किस्मत वाली हूं मैं अपनी ही धुन में खोई रहती किसी से जुड़ी किसी से कटती कुछ ऐसी है मेरी हस्ती नवजीवन की नींव रखूं में रिश्ते के हर फेर में पिसती