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मई, 2008 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नेकी कर दरिया में डाल

क्या कभी आपने अपने पड़ोसी की मदद की है। अगर हां, तो आगे से मत कीजिएगा. चौंक गये होंगे कि कल एक अनजान महिला की मदद ना करने पाने पर परेशान होने वाला शख्स आज अचानक इतना उद्वेलित क्यों है. तो आइये आपको एक सच्ची कहानी सुनाता हूं. लगभग ५२ साल पहले की बात है, मेरे पिता श्री राम प्रसाद शुक्ल आठवीं की पढ़ायी के बाद दिल्ली कमाने चले गये. घर में उनके पिताजी (मेरे दादाजी, बुआ और दादी थीं). जमींदारी खत्म हो गयी थी और घर में कमानेवाला कोई नहीं था. दिल्ली में उन्हें शायद ३० रुपये महीने या १६ रुपये (पिताजी से पूछ कर बताऊंगा)की नौकरी मिल गयी. दिन भर काम करते और रात में पढ़ाई. इस तरह १०वीं तक पढ़ भी लिया. हालांकि अनुभव ने उन्हें इतना सिखाया है कि जिस कंपनी में काम करते हैं, उसका सीए भी उनसे घबराता है. हां, तो पिताजी धीरे-धीरे प्रगति करते गये और हम पांच भाई-बहनों को पढ़ाया-लिखाया और किसी काबिल बनाया. इस बीच उन्होंने गांव और रिश्तेदारी के लगभग ५० लोगों को काम दिलाया. इन्हीं लोगों में एक हैं राममणि शुक्ल, जो मेरे ताऊ लगते हैं. मेरे घर के ठीक सामने इनका घर है. पिताजी ने ताऊ जी को नौकरी दिलायी, नहीं कर पाये....

किस काबिल हूं मैं

आज दोपहर में (हमारे लिये सुबह) घर से आफिस के लिए आ रहा था. रास्ते में एक जगह पर देखा कि एक अद्धॆविक्षिप्त सा युवक एक पूरी तरह से नग्न अधेड़ महिला (शायद उसकी मां रही होगी) को फुटपाथ से गोद में उठाने की कोशिश कर रहा था. कुछ सोच पाता इससे पहले नजर घड़ी पर पड़ गयी. दो बज कर बीस मिनट हो रहे थे और आफिस पहुंचने का टाइम दो बजे का है. काडॆ जो पंच करना होता है. बस उनके लिए कुछ करने की कौन कहे, सरपट आफिस के लिए भाग लिया. बस तभी से आत्मग्लानि से भरा हूं. आखिर वे भी तो इंसान थे. क्यों नहीं मैं उनके लिए कुछ कर पाया. भले ही वह महिला पागल रही हो, क्या मैं उसके लिए एक धोती नहीं खरीद सकता है, जबकि पान मसाला पर दिनभर में कम से कम तीस रुपये खचॆ होते हैं. यही सोच रहा हूं और दिल में रो रहा हूं. आखिर में लौटा और उसी स्थान पर गया, पर वे दोनों नहीं मिले. क्या करूं?????????????????????????