संदेश

अगस्त, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जरा याद इन्हें भी कर लोः आचार्य गया प्रसाद शुक्ल सनेही

चित्र
हम भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ मना रहे हैं, हम स्वाधीनता दिवस मनाने की तैयारी कर रहे हैं। आजादी के दीवानों को कुछ खास मौकों पर याद करने की परंपरा सालों से चली आ रही है। यह हमारा दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है कि कुछ ऐसा करें, जिससे इन सबकी जरूरत ही न हो और हम पितृ ऋण से भी मुक्त हो सकें। पिछले साल हिन्दी दिवस से पहले तीन दिन हिन्दुस्तान, कानपुर के लिए कानपुर और आस-पास के जिलों के हिन्दी साहित्य के पितृों पर काम करने का अवसर मिला। अगले महीने फिर हिन्दी दिवस है। सो मन किया कि इन पितृों से अगली पीढ़ी को परिचित कराया जाए। सो इनके बारे में उपलब्ध सामग्री अंतरजाल (इंटरनेट) पर डालने का विचार आया। इसी कड़ी में पहली बार आचार्य गया प्रसाद शुक्ल सनेही के बारे में सूक्ष्म जानकारी। आचार्य गया प्रसाद शुक्ल सनेही हड़हा गांव में स्थापित सनेही जी की प्रतिमा जन्म:  21 अगस्त 1883 निधन:  20 मई 1972 हड़हा गांव, जिला उन्नाव, उत्तरप्रदेश आचार्य गया प्रसाद शुक्ल दो उपनामों से लिखते थे, त्रिशूल और सनेही। इन्हें हिन्दी कवि सम्मेलनों का स्थापना करने का श्रेय जाता है। कुछ प्रमुख कृत...
सच कहता हूं बात बड़ी है बचपन की यह आस खरी है इंसा बनना इतना मुश्किल कहकर मुझसे रोज लड़ी है #विशाल शुक्ल अक्खड़
सबको खुश करता रहा खुद में खुद घुलता रहा अंधेरा घना था बहुत दीपक सा मैं जलता रहा
हां मेरे भी दो चेहरे हैं दुनिया से हंस हंस कर बातें करना बिना वजह खुद को हाजिरजवाब दिखाना पर असली चेहरे से केवल तुम वाकिफ हो है न... क्योंकि तुम्हारे ही आंचल में तो ढलके हैं दुनिया के दिए आंसू तुम्हारे ही कदमों में झुका है  गलती से लबरेज  यह चेहरा तुम पर ही तो उतरा है  जमाने भर का  गुस्सा और यह दुनिया कहती है मैं तुम्हारे ही सबसे करीब हूं मेरा सबसे अच्छा चेहरा तुम्हारे लिए है... विशाल शुक्ल अक्खड़