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फर्ज निभाया, कर्ज बाकी

कहकर गए थे जल्दी लौट आने को तिरंगे में लिपटे चले आए घर को जरा भी न सोचा क्या हमारा होगा सिसकने को छोड़ गए हमें पल-पल को सैकड़ों सुहाग बचाए गोदें न होने दीं सूनी कलाइयां दे गए अनगिनत राखियों को मां भारती के लाल तुम कर्ज चुका गए अगली बारी फिर भूल न जाना हमको नन्ही मुनिया सहमा छोटू याद करेंगे वक्त ने जो हम पर ढाया सितम को बिटिया की विदाई बेटे के सेहरे का कर्ज है अभी बाकी कि लौटना होगा तुमको (उत्तराखण्ड में आई आपदा के दौरान चौबेपुर-कानपुर के रहने वाले जवान नित्यानंद लोगों को बचाते हुए हेलीकॉप्टर क्रैश होने से शहीद हो गए थे। उसी दौरान ये पंक्तियां अनायास कही थीं और हिन्दुस्तान कानपुर ने प्रकाशित भी की थीं। आज अचानक वह पेज मिला तो फिर से...)

नोटबंदी 5

आपकी सोच के सब ही कायल हुए नोट की चोट से सब ही घायल हुए चल जाए कहीं न सितम वक्त का तब न कहना सजन वे ही पागल हुए
चूड़ी बोली कंगन से सजन तुम मेरे सांस मैं हूं तुम्हारी बदन तुम मेरे संग रहना है नीयति हमारी तुम्हारी यूं ही देखा है तुमको नयन तुम मेरे
मौत की खबर पर मेरी वह आया है मैय्यत को मेरी कहां देख पाया है वो आईना बनकर बैठे हैं मेरी मजार पर सूरत संवारने का यह कैसा हुनर पाया है
कैश हुआ अब लेस खीस निपोरो बउआजी कैशलेस बचा शेष खीस निपोरो बउआजी खाद-पानी, दाना-सानी सब पर लग गई रोक बगुला धरो तब वेश खीस निपोरो बउआजी
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बुक डिपो संजोए है वंशीधर शैदा की यादें वंशीधर शैदा जन्म: 20 जुलाई 1904 निधन:15 नवंबर 1988 जन्म स्थान: ग्राम कक्योली तहसील कायमगंज, जनपद फर्रुखाबाद  फर्रुखाबाद की माटी में जन्मे वंशीधर शैदा की यादें उनके द्वारा स्थापित किया गया बुक डिपो संजोए हुए है। पड़ोसियों ने भले ही शैदा को नहीं देखा मगर वे उनकी शख्शियत के बारे में काफी कुछ जानते हैं। उनका घर अब काफी पुराना और जर्जर हो चुका है। यहीं पर उनके बेटे और परिवार के अन्य सदस्य रहते हैं। हालांकि उनके नाम को और जीवंत रखने के लिए शासन स्तर से कोई गंभीर प्रयास नहीं किए गए। 7 जुलाई 1927 को वंशीधर शैदा ने लोहाई रोड पर शैदा बुक डिपो की स्थापना की थी और यहीं पर रामायण प्रेस भी चलाते थे। उनकी क ई पुस्तकें ब्रिटिश सरकार ने जब्त कर उनके प्रकाशन पर रोक लगा दी थी। वर्ष 1932 में शैदा के मित्र कृष्णगोपाल चतुर्वेदी ने वाल्मीकि रामायण को तुलसीकृत रामायण की तरह दोहा चौपाइयों में रचने की इच्छा प्रकट की। उसके तुरंत बाद से ही शैदा ने रामायण की रचना प्रारंभ कर दी। शैदा की रचित पुस्तकें देश में ही नहीं बल्कि फिजी, कनाडा, बहरीन, ओमान, आस्ट्रेलिया आदि देश...
उनके घोटालों ने किया बंटाधार हो तुमने लाके छोड़ा बीच मंझधार हो इनकी उनकी सबकी नैया फंसी अब कौन लगाए इनका बेड़ापार हो 

नोटबंदी 4

तुम जो करते हो करते हो करते रहो स्वांग नित ही नया यूं ही भरते रहो सीधे-सीधे बता दो पर हमको सनम तुम तो मरते थे मरते हो मरते रहो   

नोटबंदी 3

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अब तो एटीएम भी नखरे दिखाने लगी औकात हमको ही प्रतिपल बताने लगी ढाई हजार से ज्यादा इजाजत नहीं ऐसे संदेश दे देकर हमको चिढ़ाने लगी  

नोटबंदी 2

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पहले पिंकी से उलझन बढ़ाते गए फिर नौटंकी से धड़कन बढ़ाते गए नियम लागू होगा कि नया ये नहीं साहब हर दिन हमें समझाते गए

नोटबंदी 1

नोट पर चोट पल पल लगाते चले दिलासा वह हर दिन दिलाते चले हमको झोंका उन्होंने ही लाइन में है मन की बातों से चूना लगाते चले
एक ने चुपचाप काट ली जेब हमारी दूसरा बोल बोल के काट रहा है कब होगा कैसे होगा विकास पैदा अक्खड़ अब तक रास्ता ताक रहा है

जरा याद इन्हें भी कर लोः बाबू केदारनाथ अग्रवाल

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अगस्त में भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ के मौके पर हिन्दुस्तान, कानपुर के लिए कानपुर और आस-पास के जिलों के हिन्दी साहित्य के पितृों पर किए गए काम की श्रृंखला प्रकाशित करने की शुरुआत की। किसी कारणवश यह कई महीने रुका रहा। अब फिर से कोशिश...। अपनों ने ही मिटा दीं बाबू केदारनाथ अग्रवाल की यादें  राख की मुर्दा तहों के बहुत नीचे, नींद की काली गुफाओं के अंधेरे में तिरोहित, मृत्यु के भुज-बंधनों में चेतनाहत जो अंगारे खो गए थे, पूर्वी जन-क्रांति के भूकम्प ने उनको उभारा। बाबू केदारनाथ अग्रवाल ने 1948 में जब यह कविता लिखी थी तब उन्हें क्या पता था कि पीढि़यां उनकी क्रांतिकारी चेतना को इतनी जल्दी भुला देंगी। भले ही उनके जीवन और उनकी कृतियों पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में सैकड़ों शोध किए गए हैं। उनकी रचनाओं को पढ़ने से मन के तार झंकृत हो जाते हों लेकिन बुन्देलखण्ड के कलम के इस जादूगर की यादों को संजोने वाला बांदा में कोई नहीं है। यहां तक कि जिस स्थान पर बैठकर उन्होंने दर्जनों रचनाएं कीं, उस स्थान को भी बेच दिया गया। अब न तो उनके घर का खंडहर बचा और न ही उनसे जुड़ी कोई याद। इस महा...

नोटबंदी...

बाजार से नोट घटे, मेरे पेज के लाइक... कहीं विरोधियों का हाथ तो नहीं...
तब मैं हर रोज बड़ा होना चाहता था अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता था अब हर क्षण हर दिन पछता रहा हूं बचपन में फिर लौट जाना चाहता हूं
माला से आज एक और मनका टूट गया बस यह जानो एक और 'मन का' रूठ गया