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मैं हंसता हूं वह हंसती है मैं रोता हूं वह रोती है मैं पिता हूं वह बेटी है मैं सेंकता हूं वह सिंकती है मैं खाता हूं वह घुलती है मैं याचक हूं वह रोटी है मैं सजता हूं वह सजती है मैं हर्षित हूं वह मुदित है मैं आदम हूं वह धोती है मैं सिसका हूं वह सिसकी है मैं बिलखा हूं वह बिलखी है मैं विद्यार्थी हूं वह सोंटी है मैं बढ़ता हूं वह रुकती है मैं चढ़ता हूं वह गिरती है मैं किस्मत हूं जो खोटी है -विशाल शुक्ल ‘अक्खड़’
वो कमजर्फ निगहबां को भूल जाते हैं कमबख्त कैसे बागबां को भूल जाते हैं बचकर रहना इन बेमौसमी बादलों से खुदगर्जी में आसमां को भूल जाते हैं

यह कभी नहीं लिखना चाहा

जाति, धर्म, सांप्रदायिकता, दलित, पिछड़ा, मुस्लिम, अल्पसंख्यक, हिन्दू और ऐसे न जाने कितने शब्द जबसे होश संभाला सुनता-पढ़ता चला आ रहा हूं। कभी नहीं सोचा था कि इन शब्दों को लेकर कभी कुछ लिखूंगा। स्कूल में टिफिन खोलता था तो सारे सहपाठी टूट पड़ते थे अरुई (घुइया) का भरता (भरता क्या था, उबली घुइया, हरी मिर्च, नमक और कड़वा तेल का मिश्रण हुआ करता था) खाने के लिए। मुझे भी बहुत पसंद था और है। रहेगा या नहीं, पता नहीं। हां, तो मैं कह रहा था कि उन सहपाठियों में दलित, मुस्लिम, पिछड़े और पता नहीं कौन-कौन किस-किस जाति का होता था। मैं पारंपरिक ब्राह्मण घर का, पर कोई फर्क कभी पड़ा ही नहीं। विशुद्ध ब्राह्मणवादी यह पढ़कर शायद मुझसे नाराज हो जाएं, दक्षिणपंथी मेरी आलोचना करें, कॉमरेड और धर्मनिरपेक्षता के पुरोधा अपना समर्थक मानने लगें, पर होंगे सब गलत। मियां मैं शुद्ध इनसान बने रहने की कोशिश करता हूं। हद पार न हो जाए तो किसी से ऊंची आवाज में बात करना पसंद नहीं करता। गुटखा खाकर सड़क पर थूकना मुझे पसंद नहीं। सड़क पर कभी घर का कचरा नहीं फेंका। आज मोदीजी जिस शौचालय की बात कर रहे हैं, वह हमारे गांव के घर में बचपन...