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मार्च, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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चाक चले हाथ सधे माटी की बिटिया गढ़े  कुम्हार जनक साजें मोहे धागा नाल जुदा करे आवं तपे रंग चढ़े सजनी तब ससुराल चले तेल-बाती साथ दें रोशन फिर घर-द्वार करे

महंगाई

उफ यह महंगाई, हाय ये महंगाई एक ही दिन में खा गई सारी कमाई ठोंक बजा कर हर सामान चुनतीं पत्नी जी तोड़-तोड़ कर अरमान बुनतीं सूची से कम जरूरी सामान खारिज करतीं फिर याद आ गई अचानक ही दवाई उफ यह महंगाई, हाय ये महंगाई... बर्तन की दुकान हो कपड़े की दुकान बड़ी हसरत से हर सामान देखतीं उठातीं जग फिर कप खरीद लेतीं बिटिया की साइकिल पर न आई उफ यह महंगाई.... चुन-चुन कर हर एक दीया रखतीं घूम-घूम कर जिया को तकतीं कहीं भारी न पड़ जाए बजट गुनतीं घट गई गणेश-लक्ष्मी की लंबाई उफ यह महंगाई....  हीरा तकतीं चांदी उठातीं मोलभाव कर लौटा देतीं याद आ जाता आलू-टमाटर सोच-समझकर गृहस्थी सजाई उफ ये महंगाई..... (जिया बिटिया का नाम है...)

यह जन्नत है

यह जन्नत है इसकी सुनो तुम कहानी शिकारा पर बरसे हिमालय का.. पानी यहां का हर मंजर ......बड़ा खूबसूरत हवा भी यहां की ........बड़ी ही रुहानी यह जन्नत है इसकी सुनो तुम कहानी चिनाब के दर पे लिखीं जो कथाएं बच्चों को अपने आओ ....सुनाएं कई सपूतों ने सींचा है .....इसको मोहब्बत में इसके दी कई कुर्बानी यह जन्नत है इसकी सुनो तुम कहानी बर्फों में इसके जो बारूद डाला किसकी तलब है खूं का निवाला न रंगीन बनाओ ये परियों की धरती सफेदी की है ये जनम से दीवानी यह जन्नत है इसकी सुनो तुम कहानी

रिश्ते की टूटन

रिश्ते का यूं टूट जाना कोई कहानी नहीं आंसू हैं गम के आखों से बहता पानी नहीं काश वो लम्हा बीत जाता यूं ही चुपके से सारे सिकवे भूल जाते होती ये नादानी नहीं

मैं निभाता चला गया

वो करते गए जफाएं मैं निभाता चला गया उनके दिए हर जख्म सहलाता चला गया तकदीर में तो न था ऐसा सितम ऐ खुदा तू भी तो हर गम मुझे पिलाता चला गया

कल तक

कल तक झूमे वो खत ओ किताबों में आज आये यूं मेहमां बनके ख्वाबों में रोशन जहां था जिनका मेरी इक मुस्कान पे कहने लगे, बाकी रहा न तेल अब इन चरागों में दर-ओ-दीवार के दीदार को रहते थे बेकरार मोड़ लिया मुंह हमसे रहने लगे हिजाबों में वो छत की दीवार से कोहनी टिका के रखना डूब गया सूरज गम के अंधियारे बागों में देख के आती है लबों पे मुस्कान कटीली सोच लो अक्खड़ न डूब जाना शराबों में

दीदार-ए-यार

वो गुरफा में बैठे हैं दीदार-ए-यार को पहुंचा दो कोई हाल-ए-दिल दिलदार को हसरत मिलने की हसरत ही रह गई सरनिगूं बना दिया नगमा निगार को दर्द-ए-दिल दिया दवा भी तो दे देते यतीम क्यूं छोड़ दिया अपने निजार को नीयत बदल गई निशाना बदल गया रुसवा करूं कैसे उस जां-निसार को नुक्स था मुझमें या आंखें खराब थीं बेदर कर दिया घर के पहरेदार को

ठहर बरसो सावन

ठहर-ठहर बरसो सावन सिहर-सिहर जाता वदन गीत के हर बंद में ज्यों घुमड़-घुमड़ आता सजन

सर्द मौसम की बदरी

सर्द मौसम की बदरी सितम ढा रही है शाल ओढ़े सनम तू किधर जा रही है  बूंदे गिरने लगी हैं जरा सा ठहर जाओ संभल कर चल लो कहीं न फिसल जाओ सांसों की गर्मी दे दो सदा आ रही है सर्द मौसम की बदरी सितम ढा रही है भूल से भी न तुम भूल ऐसी करो हवाओं का रुख देख कर ही चलो जुल्फों पर ऐसा क्यों कहर ढा रही है सर्द मौसम की बदरी सितम ढा रही है छोड़ो बहाने चले आओ हमदम हमसे न रंजिश दिखाओ यूं प्रियतम दिल की हर धड़कन सिहर जा रही है सर्द मौसम की बदरी सितम ढा रही है

आओ जरा शबाब

आओ जरा शबाब पे आओ तो हुजूर रुख से जरा नकाब हटाओ तो हुजूर बदरी में छिप के बैठा है चांद क्यूं मेरा लब से जरा शराब छलकाओ तो हुजूर चोरी-चोरी तकना मुस्का के छिप जाना जुल्म है अदा कोई बताओ तो हुजूर मुझसे अच्छा कैसे उस छत का है नसीब अदाओं से अपनी न दिल जलाओ तो हुजूर कहता है अक्खड़ सुनना जरा ध्यान से अब दरियादिल बनके दिखाओ तो हुजूर

कह दो

कह दो छुप के यूं न देखा करें दिल में हलचल यूं न पैदा करें सदाएं जुबां पर आने तो दें निगाहें मिला के निबाहा करें

हुक्कामों से मत पूछा

हुक्कामों से मत पूछो क्या कहती है सर्दी दीवानों से मत पूछो क्या कहती है सर्दी घर से निकले राही से चौराहे पर बैठे सिपाही से तब सब सच-सच पूछो क्या कहती है सर्दी

जानता हूं...

जानता हूं बादल तू बरसता है क्यों वो छत पर हैं बैठी तू जलता है क्यों मेरी छुट्टी है किस दिन ये भी तो जाने दिल के दर्द बता तू रोता है क्यों

कह दो छुप के यूं न देखा करें

कह दो छुप के यूं न देखा करें दिल में हलचल यूं न पैदा करें सदाएं दिल की जुबां पर ले आएं निगाहें मिला के यूं न हटाया करें गैरों से मिलते दिखाते अदाएं हमसे किया यूं न पर्दा करें जमाना है ये कुछ तो कहेगा अहसासों को यूं न रुसवा करें हिम्मत है तो हिम्मत दिखाएं हाल-ए-दिल का यूं न सौदा करें

ऐ चांद

ऐ चांद तू इतना भी क्यूं इतराया करता है इक चांद मेरे आंगन में भी खेला करता है चार दिन की तेरी चांदनी होगी तो अच्छी मेरी चंदा बिटिया से जहां महका करता है

मुहाजिर की कहानी

हर मुहाजिर की एक ही कहानी है घुटनों में पेट है आंखों में पानी है बरबस बरस उठती हैं ये अंखियां याद आती जब दादी और नानी है भैया की वो धमकी भरी बतियां पढ़ते-पढ़ते आंखें झपक जानी है पूछे कौन अम्मां से, बाहर है जाना अब कहां वैसी कोई रवानी है दिल में इक हूक सी उठती है कहां वो बचपन, कहां वो जवानी है

हुस्न वालों को इतना गुरूर क्यों है

हुस्न वालों को इतना गुरूर क्यों है इश्क वाला इतना मगरूर क्यों है उनकी ओर भी तो देख लिया करो दिलजले तुझपे इतना सुरूर क्यों है

तेरी जुल्फों की छांव का इरादा तो नहीं

तेरी जुल्फों की छांव का इरादा तो नहीं तेरी होंठों की मुस्कान का सहारा तो नहीं बस एक झलक ही काफी है मेरी सांसों को जानता हूं किसी और का है हमारा तो नहीं

किसी की यादों में

किसी की यादों में बसे हो किसी की सांसों में बसे हो दिल हारा है, इजहार करो किसी के ख्वाबों में बसे हो

चाहत की तपन

चाहत की तपन से जलने लगा मन मिलन की खुशबू से खिलने लगा तन फूलों की गोद में भंवरा लगा खेलन कोयलों की कूक संग आ गया बसंत

ठहरे हुए पानी में

ठहरे हुए पानी में कुछ हलचल मचाई जाये इश्क की कोई दास्तां दुनिया को सुनाई जाये समझ बैठे हैं जो हमको मुहब्बत का मारा चलो अब उन्हें उनकी औकात बताई जाये

महफिलें रास आतीं नहीं

महफिलें रास आतीं नहीं तन्हाई का कता दे दो मंजिलें पास आतीं नहीं गहराई का पता दे दो डूब गाए जाने कितने ही दिल सुरमई आंखों में अब हमें भी ऐसी किसी बेवफाई की सजा दे दो

निगाहें उनकी भी

निगाहें उनकी भी किसी को ढूंढ़ा करती हैं बहुत कुछ कहना है, इशारों से बचती हैं लबों पर ले आओ कहानी अपने दिल की जुबां तुम कुछ तो बोलो मिन्नतें करती हैं

करो कुछ बात

करो कुछ बात तो हर बात आगे बढ़ती है दिल होते गुलजार जब बात आगे बढ़ती है महकी उनकी याद तो टपक गए जज्बात तबीयत होते नासाज जब बाते आगे बढ़ती है

तुम्हारे गाल पे...

तुम्हारे गाल पे इक काला तिल है उसी ने लूटा मेरा दिल है जरा शराफत से पेश आओ तुम्हारी अदा बड़ी ही कातिल है

हर एक हर्फ सवाल लिये फिरता है

हर एक हर्फ सवाल लिये फिरता है हर लफ्ज तेरा नाम लिये फिरता है कुछ तो कह दो जुबां से अब अपनी हर लम्हा यही आस लिये फिरता है

सच कहूं तो

सच कहूं तो लोग बुरा कहते हैं चुप रहूं तो लोग बुरा कहते हैं नहीं पिसूंगा लोगों के फेर में कहने दो जो लोग बुरा कहते हैं पांच साल हमें गधा कहते हैं चुनाव आया अब अब्बा कहते हैं हम देखेंगे इन चुनावी बेटों को कितने चोरों को सच्चा कहते हैं

होली खेलब न कन्हाई

होली खेलब न कन्हाई घर जाइब कइसे सासू पुछिहैं दस सवाल समझाइब कइसे होली खेलब न कन्हाई... रंग-बिरंगा देख ससुरजी होइ जइहैं नाराज रामजी मोरे कछु न बोलिहैं मुंह लेहैं घुमाय अपने मन कय घनी खुशी बताइब कइसे होली खेलब न कन्हाई... ननद हमरी बड़ी सयानी कइदी यहर-वहर बात-बात पर ताना मारी होई जियब दूभर दुसरे कय चिंता नाही, मन का बहलाइब कइसे होली खेलब न कन्हाई.... फागुन मा देवर बन घूमयं टोला कय सब बुढ़वय रंगयक बहाने करिहैं छेड़खानी उम्र न देखिहैं वय पड़िगेन बीचेम जव हम उनके जिव बचाइब कइसे होली खेलब न कन्हाई...

होली खेली दुनिया सारी

होली खेली दुनिया सारी भर-भर पिचकारी साली न आयी रे अबकी हमारी लाल गुलाबी हरे रंग में रंग गए चेहरे सबके कुछ रंग लगाए बहके कुछ भंग चढ़ाए खिसके रंग चढ़े न हम पर कोई भर-भर मारी पिचकारी साली न आयी रे अबकी हमारी कारा देखें गोरा देखें कोरा कागज देख खदेड़ें कुर्ता रंग दें साड़ी रंग दें दादा भी मुंह न मोड़ें देवर खेलयं भाभी खेलयं खेलयं सियादुलारी साली न आयी रे अबकी हमारी होली खेली दुनिया सारी भर-भर पिचकारी साली न आयी रे अबकी हमारी