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कभी किसी पर भरोसा न करो, कभी किसी का भरोसा न तोड़ा सोचो शायद कोई इम्तहान ले रहा है, समय का यही दस्तूर है

इस दीवार को तोड़ दो

ये जो दीवार है, इस बड़ी सी दीवार को तोड़ दो अपने अस्तित्व पर हो रहे हर वार को मोड़ दो। संसद और सड़क के बीच तकरार होनी चाहिए, रहनुमाओं की बनाई हर तलवार तोड़ दो। जो आए आंच किसी दामिनी के दामन पर, जुल्मी अपने हों या पराए जवाब मुंहतोड़ दो। आ गया है जोश जो देखो अब न दबने पाए, मन में हमारे व्याप्त है आक्रोश न सोने पाए। चुन-चुन निकालो भड़ास हर एक दरिंदे पर हमारी जमीं पर कोई मदहोश न रहने पाए। रह गए जुल्म सहते गर अपने समय का आने वाला वक्त कहीं गर्दिश में न बीत जाए। कल तलक थी जो रात काली और भयावह वह रात यूं ही अपनी आभा में न बीतने पाए।

बिना शीर्षक

मेरी रचना में आज बैठा हुआ आक्रोश है हर तरफ फैला हुआ यह कैसा विद्वेष है। अदम की जुर्रत आ गई है मुझमें या कोई और नया मेरा यह रूप है। विधायक, सांसद और मंत्री जी कोई तो बताए कैसी नयी यह धूप है। यह वक्त का सितम नहीं, अपनों ने लगाई आग है चलो उठ जाओ राजू, बब्लू, पप्पू, छोटू और चिंटू अब भी सोते रहना भविष्य के लिए अपराध है। आज भी सोते रह गए जो पीढ़ियां माफ नहीं करेंगी उठ जाओ नन्हकी, बब्ली, सिम्मी, डिंपी और जिया वसुंधरा पर आज उतरा नया एक और अभिशाप है।

निःशब्द हूं, स्तब्ध हूं, मैं भी एक दामिनी का बाप हूं....

कल तलक फलक पर चमक रही थी दामिनी आज देखो मां की गोद में चैन से पड़ी है सोई,  उद्विग्न हूं कि उसके ऐसे जाने का विधान न था वहशियों की भेंट चढ़ेगी काल को भी गुमान न था किसकी दोषी थी वह, क्यों उस पर अत्याचार हुआ गांधी-गौतम की धरती पर क्यों उससे व्यभिचार हुआ उम्मीदें खाक हो गईं, सपने सब बेईमानी निकले बाप, भाई, बेटा, सारे रिश्ते ही अभिमानी निकले बेटी-बहना-मां की इज्जत पर छाया एक अभिशाप हूं निःशब्द हूं, स्तब्ध हूं, मैं भी एक दामिनी का बाप हूं...

हर दरिया के सीने में एक आग जलनी चाहिए

हंगामों के बल कहां कब कौन जीता है जहां में हर दरिया के सीने में एक आग जलनी चाहिए कल तलक बैठे थे जो लाश बनकर अपने घर में उन लाशों के सीने में भी अब हलचल होनी चाहिए आज नहीं कोई दुष्यंत यहां झकझोरने को गजलों से कर हकीकत गजल को उन्हें तो इज्जत देनी चाहिए अदम भी तो रहे नहीं अब कौन कहे हमारी पीड़ा आक्रोश में ही सही अदम की आवाज होनी चाहिए