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मार्च, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

चलो कुछ लिखते हैं...

लिखना है कुछ, पर क्या...यह पता नहीं। तो बस यूं ही कुछ भी क्यों लिख दें। कोई वजह तो होनी चाहिए कुछ लिखने की। क्या कहा... अरे नहीं बाबा, मैं वह नहीं लिख सकता जो तुम चाहते हो। राजनीति पर मेरी कलम नहीं चलती। उफ, फिर वही...। अरे भाई मैं मोदी समर्थकों को बुरा-भला क्यों कहूं। न-न कांग्रेसियों से भी मेरी अदावत नहीं। नहीं भाई, किसी भी राजनीतिक दल के बारे में कुछ बुरा नहीं लिख सकता, होली के मौके पर भी नहीं। अखलाख और डॉ. नारंग का मुद्दा विशुद्ध कानून-व्यवस्था का मामला है, इसे राजनीति की तराजू पर मैं क्यों तौलूं। हटो जी... कानून को अपना काम करने दो। क्या... छोड़िए न सब जानते हैं कि दंगे क्यों और कैसे होते हैं, वहां मगजमारी का कोई फायदा नहीं। ये सब छोड़िए, बस इतना जान लीजिए कि जब भी लिखूंगा, अपनी लिखूंगा, अपने घर की लिखूंगा, अपने समाज और देश की लिखूंगा। पूरे विश्व की लिखूंगा पर क्या लिखूंगा...सोचते हैं...।

अमवा पर बौर खुब आय गयव रे

चित्र
अमवा पर बौर खुब आय गयव रे होली मा बुढ़ऊ बौराय गयव रे रंग लिहिन मूंछ खिजाब लगाय के धोती से पैंट मा आय गयव रे छोड़ दिहिन लाठी देह सिधाय के कमरियव मा लचक आय गयव रे सांझ सबेरे कन घुसेड़ू सजाय के फिल्मी धुन पर रिझाय गयव रे चल दिहिन ससुरे झोरा उठाय के रस्ता मा चक्कर खाय गयव रे गोरी का मेकअप नजर लाय के बूढ़ा कय गठरी भुलाय गयव रे चाल ढाल मा बदलाव पाय के बूढ़व के ताव आय गयव रे उठाय लिहिन झाड़ू चश्मा लगाय के बुढ़ऊ का फागुन भुलाय गयव रे विशाल शुक्ल अक्खड़

https://www.youtube.com/watch?v=9IjWKZTd6bk

https://www.youtube.com/watch?v=9IjWKZTd6bk

जा पोटली झाड़, पुरस्कार छांट और मीडिया को बुला...

(26 अक्तूबर 2015 को हिन्दुस्तान कानपुर के जमूरे जी कहिन कॉलम में प्रकाशित) का रे जमूरे! तनिक पोटलिया तो खंगाल...। कौन सी हुजूर? प... वाली की द... वाली? का बताएं हम तुहंय...बकलोल कय बकलोल रहिगेव। द अक्षर हम सीखेन हैं का...? प वाली...और उहव सरकारी प वाली..., जेम्मा सब सरकारी प हों। देख कउनव प है जौने का ल किया जाय...? हुजूर, अब यह ल... क्या है? प माने अब तक मिले पुरस्कार। द का मतलब देने से है। ई ल क्या है? अरे जमूरे... ल माने लौटावय वाले पुरस्कार। देख कउनव पुरस्कार झाड़-पोंछ कय लौटावा जाय सकत है का? सब पड़े-पड़े सड़त हैं। जवन सबसे पुराना होय गा हो, वहका निकाल, साफ कर...मीडिया का बुला। दुनिया का पता तव चलय कि हम्मय पुरस्कार मिला रहा। कउनव यादय नाही राखत कि हमहूं का पुरस्कार मिला रहा। यही आंधी मा गांधी बन जाव बच्चा। अच्छा, तो आप भी सांप्रदायिक हवा के खिलाफ हैं हुजूर। पहले तो कभी जिक्र नहीं किए। इतने दिन से मैं आपके साथ हूं, पर कभी लगा ही नहीं कि धर्म-सांप्रदायिकता जैसे शब्द आपके लिए कोई मतलब रखते हैं। जिससे मिले हंसकर मिले। फिर अचानक आपको भी माहौल में सांप्रदायिकता की बू कैसे आने ल...

उतरा है समाजवाद विधायक निवास में...

(29 जून 2015 को हिन्दुस्तान कानपुर में जमूरे जी कहिन कॉलम में प्रकाशित) सुनो...सुनो...सुनो देश की सुनो...परदेस की सुनो इनकी सुनो...उनकी सुनो सब सुनाने आया है जमूरा...। का रे जमूरे! जी, हुजूर। ई सब का हो रहा समाजवाद मा? अरे हुजूर! समाजवाद मा तौ सब चकाचक हय। बच्चा लोग अब आउर समय से पहिले बड़ा होय रहा हैं। लैपटाप मिलत है, टैबलेट कय लालीपाप भी थमाय दीन गा है। बिजुली आवय चाहे नाही, लैपटपवा चार्ज करावय बाजार पहुंच जात हैं, फिलमी गाना सुनत हैं औ पता नाही काव खिटिर-पिटिर करत हैं कि देश-दुनिया कै खबर बताय दियत हैं। कहत हैं कउनव गूग्गल महाराज हैं वम्मा जे सबकुछ जानत हैं। आउर तौ आउर तमाम जन कां पिंसिन मिलति है। छोटके बच्चन का तौ स्कुलवा मा दूधव दीन जाय लाग है। आउर का चाही हुजूर। जमूरे! तोहरे दिमाग मा तौ भूसा भरा है। अरे नाही हुजूर...कहूं अदम गोण्डवी वाले समाजवाद कय चर्चा तव नाही करत हव...उनकय तव अलगय राग रहा। कहत रहे, काजू भुनी प्लेट में, व्हिस्की गिलास में उतरा है समाजवाद विधायक निवास में धत्त जमूरे...ई तौ बहुत पुरान बात है। हम आज कय बात करित है...अरे, कुछ आगे कय सोचव... देश-द...

अथश्री चहचहाहट कथा...यह कथा है इनकी, उनकी, सबकी...

(06 जुलाई 2015 को हिन्दुस्तान कानपुर में प्रकाशित) चीं चीं...चीं चीं चीं चीं...चीं चीं अरे हुजूर! यह क्या हाल बना रखा है, चहचहा क्यों रहे हैं? अच्छे-खासे इनसान हैं, चिडि़या बने क्यों घूम रहे हैं? उफ जमूरे! रह गए जमूरे के जमूरे ही। इस चहचहाहट में बड़े-बड़े गुण। निर्गुण, सगुण, दुर्गुण...सारे गुण इसमें समाए हैं। जब भी लगे कि आसमां में तुम्हारे नाम का चांद डूबने लगा है, दन्न से एक बार चहचहा दो...। जैसे बीट करने से पहले पक्षी नहीं देखते कि गंदगी किस पर गिरेगी, वैसी ही इनसान की चहचहाहट होनी चाहिए। इसके बड़े फायदे हैं। कौन दुनिया की बात कर रहे हुजूर! हमारे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा...? यही तो खास बात है इस चहचहाहट में जमूरे। किसी के कुछ समझ में नहीं आता। चहचहाने वाला चहचहा देता है और लोग जूझ मरते हैं। और तो और जो लोग बयान बहादुर बनकर इस चहचहाहट पर ताल ठोंकते हैं उनके भी समझ में नहीं आता कि आखिर किस बात पर कट-मर रहे हैं। उस बात का कोई मतलब है भी कि नहीं। वह बात किसके खिलाफ जा रही है। हुजूर! कुछ पल्ले पड़े उसके पहले यह बताइए कि यह चहचहाहट है किस बला का नाम? तो सुनो हे जमूरे! आधुनिक क...

तुमने हमें ठोकर जो मारी न होती

तुमने हमें ठोकर जो मारी न होती नशीली गजल यह हमारी न होती चलन है जहां का बड़ा ही निराला जो ये यूं न होता तो तू यूं न होती मोहब्बत की ऐसी अदा पर फिदा मैं तुझमें न होता तू मुझमें न होती मिलन को हमारे चूनर रंगा कर गगन यूं न होता धरा यूं न होती