हर दरिया के सीने में एक आग जलनी चाहिए

हंगामों के बल कहां कब कौन जीता है जहां में
हर दरिया के सीने में एक आग जलनी चाहिए

कल तलक बैठे थे जो लाश बनकर अपने घर में
उन लाशों के सीने में भी अब हलचल होनी चाहिए

आज नहीं कोई दुष्यंत यहां झकझोरने को गजलों से
कर हकीकत गजल को उन्हें तो इज्जत देनी चाहिए

अदम भी तो रहे नहीं अब कौन कहे हमारी पीड़ा
आक्रोश में ही सही अदम की आवाज होनी चाहिए

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