खुद्दारी
बड़े खुशफहम हो तुम शर्म मगर आती है मुझको
कभी इस दर-ओ-दीवार पर सिर्फ राज तुम्हारा था
घरौंदे बनाए थे हमने रेत से समंदर के किनारे
मैं कहां था बस तुम थे और आफताब तुम्हारा था
गीत मेरे थे गज़ल मेरी थी छंद का हर बंद मेरा था
झूम उठी दुनिया जिस पर बस वो साज तुम्हारा था
फकत इस वास्ते कि सुन न पाएं लोग मुझको
लुटा दिया तुमने हर वह असबाब तुम्हारा था
सितम तो देखो वक्त ने कैसा ढाया है तुमपर
गीत गा रहा हूं मैं अब यह अश्फाक हमारा है
(अश्फाक-सहारा)
कभी इस दर-ओ-दीवार पर सिर्फ राज तुम्हारा था
घरौंदे बनाए थे हमने रेत से समंदर के किनारे
मैं कहां था बस तुम थे और आफताब तुम्हारा था
गीत मेरे थे गज़ल मेरी थी छंद का हर बंद मेरा था
झूम उठी दुनिया जिस पर बस वो साज तुम्हारा था
फकत इस वास्ते कि सुन न पाएं लोग मुझको
लुटा दिया तुमने हर वह असबाब तुम्हारा था
सितम तो देखो वक्त ने कैसा ढाया है तुमपर
गीत गा रहा हूं मैं अब यह अश्फाक हमारा है
(अश्फाक-सहारा)
टिप्पणियाँ