मुहाजिर की कहानी

हर मुहाजिर की एक ही कहानी है
घुटनों में पेट है आंखों में पानी है
बरबस बरस उठती हैं ये अंखियां
याद आती जब दादी और नानी है
भैया की वो धमकी भरी बतियां
पढ़ते-पढ़ते आंखें झपक जानी है
पूछे कौन अम्मां से, बाहर है जाना
अब कहां वैसी कोई रवानी है
दिल में इक हूक सी उठती है
कहां वो बचपन, कहां वो जवानी है

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