कल तक

कल तक झूमे वो खत ओ किताबों में
आज आये यूं मेहमां बनके ख्वाबों में

रोशन जहां था जिनका मेरी इक मुस्कान पे
कहने लगे, बाकी रहा न तेल अब इन चरागों में

दर-ओ-दीवार के दीदार को रहते थे बेकरार
मोड़ लिया मुंह हमसे रहने लगे हिजाबों में

वो छत की दीवार से कोहनी टिका के रखना
डूब गया सूरज गम के अंधियारे बागों में

देख के आती है लबों पे मुस्कान कटीली
सोच लो अक्खड़ न डूब जाना शराबों में

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जरा याद इन्हें भी कर लोः आचार्य गया प्रसाद शुक्ल सनेही

तब यह जाना मैंने

जज्बातों की कहानी