सागर बन फिरता रहा नदियों ने राहें मोड़ लीं
बादल बन बरसा दिल जब सखियों ने बाहें छोड़ दीं
मिलन की बेला में भी न आया मुझको करार
आंसू बन निकले अरमां अपनों ने उम्मीदें तोड़ दीं

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जरा याद इन्हें भी कर लोः आचार्य गया प्रसाद शुक्ल सनेही

तब यह जाना मैंने

जज्बातों की कहानी