हर शहर में हर बार एक मकां ढूंढ़ता हूं
हमारे गांव में तो कभी ऐसा नहीं होता
वहां हर घर का दरवाजा खुला रहता है
रहने को यहां कोई कमरा नहीं होता
बहुत दिलदार हैं मेरे गांव की गलियां
कोई मोहल्ला वहां उदास नहीं होता
यह शहरों की कैसी रवायत बन गई
कोई भी चेहरा खुशमिजाज नहीं होता
रंग-ओ-बू में लिपटा हुआ इंसा ऐसा
कोई किसी का अपना नहीं होता
याद आता है वह बूढ़ा बरगद अपना
यहां दरख्तों पर कोई परिंदा नहीं होता
मेरी किस्मत मां से दूर भटकता हूं
यहां कोई बोसा लेने वाला नहीं होता

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