हम भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ मना रहे हैं, हम स्वाधीनता दिवस मनाने की तैयारी कर रहे हैं। आजादी के दीवानों को कुछ खास मौकों पर याद करने की परंपरा सालों से चली आ रही है। यह हमारा दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है कि कुछ ऐसा करें, जिससे इन सबकी जरूरत ही न हो और हम पितृ ऋण से भी मुक्त हो सकें। पिछले साल हिन्दी दिवस से पहले तीन दिन हिन्दुस्तान, कानपुर के लिए कानपुर और आस-पास के जिलों के हिन्दी साहित्य के पितृों पर काम करने का अवसर मिला। अगले महीने फिर हिन्दी दिवस है। सो मन किया कि इन पितृों से अगली पीढ़ी को परिचित कराया जाए। सो इनके बारे में उपलब्ध सामग्री अंतरजाल (इंटरनेट) पर डालने का विचार आया। इसी कड़ी में पहली बार आचार्य गया प्रसाद शुक्ल सनेही के बारे में सूक्ष्म जानकारी। आचार्य गया प्रसाद शुक्ल सनेही हड़हा गांव में स्थापित सनेही जी की प्रतिमा जन्म: 21 अगस्त 1883 निधन: 20 मई 1972 हड़हा गांव, जिला उन्नाव, उत्तरप्रदेश आचार्य गया प्रसाद शुक्ल दो उपनामों से लिखते थे, त्रिशूल और सनेही। इन्हें हिन्दी कवि सम्मेलनों का स्थापना करने का श्रेय जाता है। कुछ प्रमुख कृत...
अम्मां की आंचल से निकला तब यह जाना मैंने धूप-बारिश, गलन-तपन भी दुनिया में ही होती है भूख-प्यास, दुख-बीमारी, सोना-जगना और रोना अम्मां के साये में भला जगह कहां इनको मिलती है अम्मां को मैंने कभी कहां चैन से सोते देखा है मुस्कान भरी नींद बच्चे की हो तो वह भी सोती है जब भी रोया हूं अम्मां मन ही मन बहुत रोई है आपाधापी खींचातानी में भी वह पास हमारे होती है ममता उसकी अटल सत्य बाकी सब हवाहवाई है तब जाना दुनिया क्यों मां के जाने पर इतना रोती है
चलो आज तुम्हें सुनाते हैं जज्बातों की एक कहानी इसमें न कोई राजा है और न ही है कोई रानी मन का बंधन दिल की धड़कन सांसों की महक अहसासों की खनक इतनी सी है इसकी रवानी चलो आज तुम्हें सुनाते हैं जज्बातों की एक कहानी इसमें न कोई राजा है और न ही है कोई रानी गंगा सी निर्मलता मासूम एक निश्छलता गोधूलि की बयार हारे दिल की पुकार राधा जैसी वो केशव की दीवानी चलो आज तुम्हें सुनाते हैं जज्बातों की एक कहानी इसमें न कोई राजा है और न ही है कोई रानी
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